ALL अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रीय उत्तर प्रदेश अन्य राज्य बिजनेस खेल सिनेमा रोजगार धर्म मेट्रोमोनियल
यूपी का सीएम बनते-बनते रह गए मनोज सिन्हा के साथ अबकी किस्मत ने नहीं  किया मजाक - अजय कुमार
August 6, 2020 • AMIT VERMA • राष्ट्रीय
वरि० पत्रकार अजय कुमार
लखनऊ। 2017 के विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिले शानदार बहुमत के बाद उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते-बनते रह जाने वाले और 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत नहीें हासिल कर पाने के कारण केन्द्रीय मंत्री पद गंवाने वाले   पूर्व केन्द्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता मनोज सिन्हा के साथ अबकी से किस्मत ने किसी तरह का कोई मजाक नहीं किया, जिसके चलते मनोज सिन्हा जम्मू कश्मीर के नए उपराज्यपाल बनने जा रहे हैं। उन्हें गिरीश चंद्र मुर्मू की जगह जम्मू कश्मीर का नया उपराज्यपाल नियुक्त किया गया है। गिरीश ने गत दिवस उपराज्यपाल पद से  अचानक इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद मनोज सिन्हा को जम्मू कश्मीर का नया उपराज्यपाल बनाया गया है। जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन होने के बाद बीते साल 31 अक्टूबर को मुर्मू ने पहले उपराज्यपाल के रूप में यह पद संभाला था। मनोज सिन्हा जम्मू कश्मीर पुनर्गठन के बाद के दूसरे उप-राज्यपाल होंगे। मनोज सिन्हा को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाए जाने से कुछ लोगों का आश्चर्यचकित हो जाना स्वभाविक है, क्योंकि उपराज्यपाल की रेस में जिन लोगों का नाम चल रहा था,उसमें मनोज सिन्हा शामिल नहीं थे।
    जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बनाए गए बीजेपी नेता मनोज सिन्हा की पहचान की बात की जाए तो मनोज सिन्हा उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर से आते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में मनोज सिन्हा गाजीपुर संसदीय सीट से सांसद चुने गए थे। सिन्हा, मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में रेल राज्यमंत्री रह चुके हैं। पिछले साल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने गाजीपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन वह जीत नहीं सके थे। गठबंधन के बहुजन समाज पार्टी उम्मीदवार अफजाल अंसारी से उन्हें 119,392 वोटों से हरा दिया था, लेकिन हार के बाद भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मनोज सिन्हा के प्रति विश्वास कम नहीं हुआ था। बात 2017 के विधान सभा चुनाव के बाद मनोज सिन्हा के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते-बनते रह जाने की कि जाए तो उस समय जो हालात थे,उसको देखते हुए भाजपा आलाकमान ने मनोज की जगह योगी को मुख्यमंत्री बनाना ज्यादा बेहतर समझा था। दरअसल, मनोज सिन्हा का सौम्य स्वभाव का होना ही उनके सीएम बनने की सबसे बड़ी बाधा बन गया। बीजेपी आलाकमान को लगता था कि अगर कड़क छवि वाले किसी नेता को सीएम नहीं बनाया गया तो प्रदेश की कानून व्यवस्था संभालना आसान नहीं होगा। इसी लिए अंत समय में योगी का नाम फायनल कर दिया गया,जबकि मनोज सिन्हा शपथ ग्रहण करने से पूर्व मंदिर में माथा टेक आए थे और उनको सीएम को मिलने वाली सुरक्षा भी मुहैया करा दी गई थी। कहा यह भी गया था कि मनोज सिन्हा को इस लिए भी सीएम नहीं बनाया गया क्योंकि वह जाति से भूमिहार हैं और उत्तर प्रदेश में भूमिहार कोई वोट बैंक नहीं है,जबकि बीजेपी योगी को सीएम बनाकर क्षत्रियों और साधू-संतो दोनों को लुभाना चाहती थी।
      मनोज सिन्हा के उपराज्यपाल पद पर नियुक्ति के बाद आया जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला का ट्वीट काफी सटीक रहा। उन्होंने कहा,‘कल रात एक या दो नाम थे, जिनके नाम सामने आए थे और इनका नाम उनके बीच नहीं था। आप इस सरकार पर हमेशा भरोसा कर सकते हैं कि ये स्रोतों से पहले लगाए गए किसी भी कयास के विपरीत  अप्रत्याशित नाम सामने आता है।
   जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद-370 के हटाए जाने की पहली वर्षगांठ पर बुधवार देर शाम, केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। मुर्मू के इस्तीफे की खबर से प्रशासन खेमे से लेकर सियासी पार्टियों में हडकंप मंच गया था। मुर्मू ने देर रात राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को इस्तीफा भी सौंप दिया था। वहीं, मुर्मू के इस्तीफे का कारणों का पता नहीं चला, लेकिन अफवाहें हैं कि कुछ वरिष्ठ नौकरशाहों के कामकाज से वह खफा थे। सूत्रों के अनुसार, मुर्मू की केंद्र में किसी बड़े ओहदे पर नियुक्ति हो सकती है।
  मुर्मू के इस्तीफे की खबर 05 अगस्त की शाम को सूर्यास्त के साथ ही फैली। इससे पूर्व उन्होंने श्रीनगर में दोपहर से लेकर शाम तक निर्धारित सभी कार्यक्रम रद कर दिए। उन्होंने दिल्ली से आए मीडियाकमियों के अलावा अन्य उच्चस्तरीय प्रशासनिक प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक को भी रद कर दिया। दोपहर करीब 12 बजे के बाद किसी से कोई भेंट नहीं की। इसके बाद वह जम्मू में ही रहे जहां उन्होंने उत्तरी कमान के जीओसी-इन-सी लेफ्टिनेंट जनरल वाईके जोशी के साथ मुलाकात करने के अलावा प्रशासनिक परिषद की बैठक में हिस्सा लिया। मुर्मू के करीबियों की मानें तो वह बीते कुछ दिनों से लगातार इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रहे थे। नागरिक सचिवालय और स्थानीय हलकों में जारी चर्चाओं को अगर सही माना जाए तो जम्मू-कश्मीर प्रशासन में कुछ वरिष्ठ नौकरशाहों के साथ उनकी पटरी नहीं बैठ रही थी। इस मसले पर उन्होंने कथित तौर पर दिल्ली में गृहमंत्री और प्रधानमंत्री से भी चर्चा की थी। जीसी मुर्मू के इस्तीफे की चर्चा कई दिनों से चल रही थी।