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ये 21 दिन का रिबूट - पायल लक्ष्मी सोनी
April 7, 2020 • AMIT VERMA • उत्तर प्रदेश

वाराणसी। मानवजाति में अभी भी संवेदनाएं हैं, वह जीवित है ऐसा लगता है। क्या भूखा,क्या नंगा,क्या अमीर, क्या गरीब, क्या जाति,क्या धर्म,क्या मजहब,क्या छोटा,क्या बड़ा? जैसे सबका भेद मिटा गया हो। एक छोटे से वायरस का मानव जीवन में प्रवेश करते ही सब कुछ परिवर्तित हो गया। ईश्वर द्वारा बनाया यह पृथ्वी रूपी शतरंज अपनी सारी गोटियों को अपनी-अपनी जगह फिट करने में लगा है।। मानव अक्सर स्वार्थी हुआ करता है लेकिन इस संकट काल की परिस्थिति ने मानव के स्वार्थ को कहीं दूर रख दिया है।  मनुष्य- मनुष्यता की ओर बढ़ रहा है,उसकी संवेदनाएं उसके अपनों के साथ जुड़ रही हैं। उसका समय अपनों के लिए लगने लगा है। यह काल, यह 21 दिन एक तरह से इस पृथ्वी के लिए इस मानव जीवन के लिए रिबूट (REBOOT) की स्थिति है,जिस प्रकार मोबाइल के सही तरीके से न चलने पर उसमे कुछ फंक्शन के ना चलने पर मोबाइल को वापस से रीस्टार्ट किया जाता है।उसी तरह इस संकट काल में इस पृथ्वी को भी 21 दिन के लिए रिबूट मोड पर डाल दिया गया है।जिसका परिणाम यह देखने में आ रहा है की पूरी पृथ्वी एक भयंकर बोझ से हल्की हो गई है। ना कहीं धुल है न धुंवा है, पुष्प भी स्वयं से इतराते हुए अपनी डालो पर लहरा रहे हैं। क्योंकि उन्हें कोई तोड़ नही पा रहा है। ना किसी से कोई भेदभाव, न मनमुटाव, जिंदगी की जरूरत भी कम हो गई है। वरना जीवन के खर्चे बड़े होते है। मां गंगा स्वतः ही निर्मल हो गई है।वायु प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण और मृदा प्रदूषण भी खत्म हो गया है,नीला आसमान पहले से और नीला साफ लगने लगा है। पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देने लगी है,जो कभी मुंडेर पर गौरैया नहीं आती थी वह भी लौट कर मुंडेर पर बैठने लगी हैं और तो और अपनी चहचहाहट से सुबह लोगों को नींद से जगा रही है। प्रकृति फिंर से मुस्कुराने लगी है। आकाश साफ दिखने लगा।जानवरों को मारने से लोग डरने लगे है। अब कोई बेवजह उन्हें नहीं मारता। ना ही किसी की थाली में जानवर दिखाई दे रहे हैं।अब तो ऐसा हुआ कि जानवर भी फिंर से जीने लगे। पशु-पक्षियों की दुआएं अब इस संकट काल मे मनुष्यों के काम आ रही है। मंदिरों में घंटे नही बज रहे है और आरतियां नही हो रही है लेकिन घर के मंदिरों में लगातार विश्वास का दिया अवश्य जल रहा है। और रोज़ होने वाले शंखनाद से इस अदृश्य लड़ाई में योद्धा होने का प्रमाण मिल रहा है।
इस समय पूरा देश योद्धा बन डट कर लड़ रहा है। 
      एक अदृश्य शक्ति, जिसने लोगों को पास आने से रोका है लेकिन उसी ने स्वतः ही मनुष्य को मनुष्यता से जोड़ा दिया है।और यह सोचने पर मजबूर कर दिया की कहीं से कोई भी भेदभाव नहीं है।एक वायरस किसी में भेदभाव नहीं करता। ईश्वर द्वारा बनाई इस पृथ्वी का मनुष्यों ने बहुत शोषण किया है,चाहे वह जल हो,वृक्ष हो,नदियां हो,गंगा हो या जानवर हो,पक्षी हो,मनुष्य ने मानवता को  बहुत चोट पहुंचाई है जिसके कारण व्यक्ति-व्यक्ति का दुश्मन बन बैठा और स्वयं को श्रेष्ठ घोषित करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने लगा और यह वायरस इसी हथकंडे का परिणाम है कोई भी मनुष्य जितना भी चाहे आगे बढ़ जाए परंतु ईश्वर से आगे नहीं चल सकता। मनुष्य इस दौरान मनुष्यता सीख रहा है, बुजुर्गों के साथ समय गुजार रहा है, घर पर पत्नी का सहयोग दे रहा है, उस पत्नी का भी जिसे कभी शराब पी कर मारता और शोषित करता है।आज इस दौरान बलात्कार नहीं हो रहे हैं, लड़कियां, महिलाएं स्वयं को सुरक्षित महसूस कर रही है और प्रार्थना कर रही है इसी प्रकार बलात्कारियों पर भी हमेशा के लिए लॉकडाउन वाला प्रतिबंध लग जाये। कोई आत्महत्या नहीं कर रहा है,क्योंकि कोई अवसाद में नही है। कोई घरेलू हिंसा नहीं हो रही है क्योंकि अंतर्मन का अहम खत्म हो गया, कहीं भी चोरी नहीं हो रही है क्योंकि जरूरतें बेमानी लगने लगी है,कहीं भी छल-कपट नही हो रहा क्योंकि लोग इस समय जीवन को अधिक महत्वपूर्ण समझ रहे हैं। वह बच्चे,वह पत्नियां खुश हैं जिनके पिता और पति शराब  पी कर घर आते रहे हैं और अपनी पत्नियों को मारते रहे हैं।यह अब बंद हो गया वह सुकून में है लेकिन 21 दिन बाद के जीवन से डरी और सहमी है। छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कर नही हो पा रहे हैं क्योंकि वह अपने रिश्तेदारों से,पड़ोसियों से,सुरक्षित हैं। लोग अपनी मर्जी से एक दूसरे का सहयोग कर रहे हैं, भूखों को भोजन करा रहे हैं, संवेदनाएं जागृत हो गई हैं,क्योंकि पृथ्वी रिबूट मोड में चली गई है और यह स्थिति है कि आज प्रकृति सांस ले रही है। यह प्रकृति बहुत दिनों से सांस लेना चाह रही थी,दम घुट रहा था उसका और वह प्रदूषण मुक्त हो गई 21 दिनों के लिए। वह अब खुल कर सांस ले पा रही है।लोग प्रकृति के करीब जा रहे हैं, जिनके पास समय नहीं था वह भी फूल-पौधों से बातें कर रहे हैं। ना चाहते हुए भी एक सहयोग की भावना उत्पन्न हो रही है, इस पर यह प्रश्न उठता है कि क्या हम अपने सनातन संस्कृति की ओर फिर बढ़ रहे हैं?क्योंकि नमस्कार की स्थिति, वेद-मंत्रों के उच्चारण से पूरी पृथ्वी गुंजायमान हो रही है,शंख,घण्टे,घंटियों की गूंज से आकाश से धरती शुशोभित हो रही है,लोग नास्तिक से आस्तिक हो रहे हैं।
      हां इसी 21 दिन के लॉकडाउन में परिस्थितियां पूरी तरह से बदल गई हैं। जो लोग हमेशा घर के बाहर का भोजन किया करते थे, होटल जाया करते थे, फिल्में देखा करते थे,उसकी वजह से उनके पैसे भी बच रहे हैं, फिजूल खर्ची नहीं हो रही है,जरूरतें बिल्कुल कम हो गई हैं।जिसकी वजह से लोग अधिक स्वस्थ हो रहे हैं।बल्कि आज लोग भविष्य के लिए सोच रहे है और व्यक्ति,व्यक्ति के विषय में सोच रहा है।जिनके कभी फोन तक ना आते थे, वह भी फोन करके कुशलक्षेम पूछ रहे हैं, वह चाहे आभासी दुनिया का रिश्ता हो या फिर आपके हमारे अपने मां-पिता,भाई-बहन,चाचा-चाची,पति-पत्नी, बच्चे, मामा-मामी, भतीजे- भांजे, आज सभी एक सूत्र में पिरो कर अपनो के लिए खड़े हैं और तो और जो रिश्ते कभी किसी के लिए बोझिल थे उनपर गर्व महसूस कर रहे हैं। और जिनसे कभी महीनों-सालों बात भी नहीं हो पाती थी, इस आपाधापी व्यस्ततम जिंदगी के कारण आज उन सभी के फोन आ रहे हैं और हाल-चाल के साथ उनका प्रेम प्रदर्शन करना, मन को लुभा रहा है शायद यह प्रकृति भी अब यही चाहती है कि मनुष्य मनुष्यता की ओर बढ़े एक दूसरे में प्रेम का संचार हो, आदर का भाव हो, लोग एक दूसरे के साथ मानवता का धर्म निभाये।जैसे लग रहा है प्रकृति हमे सुधरने का एक मौका दे रही हो। क्या सचमुच यह 21 दिन सतयुग से दिनों सा लगने लगा है?  कुछ नकारात्मक बातों को अगर छोड़ दिया जाए तो यह 21 दिन किसी व्रत उपवास से कम नहीं है,जहां मनुष्य द्वारा की जाने वाले अपराधों पर मानो रोग सा लग गया हो। लोग अपने शौक पूरा कर रहे हैं,कोई पेंटिंग बना रहा है, तो कोई गाना गा रहा है, कोई गिटार बजा रहा है, कोई लेखन कार्य कर रहा है,जो लोग कभी छत पर जाते नहीं थे आज बहुत समय बाद लोग छत पर दिखाई दे रहे हैं और इस बहाने आस-पड़ोस के लोगों से कुशल क्षेम पूछ रहे हैं, कुछ लोग छत पर आज से 20-25 साल पहले वाले जिंदगी को जीने की कोशिश कर रहे हैं, जिस प्रकार छत पर लाइन से गद्दे बिछाकर लोग एक साथ सोते थे आज भी कुछ इस तरह का दृश्य देखने को मिल रहा है, कई लोगो ने अपनी छतों पर तरह-तरह के फूल और सब्जियां लगा रखी हैं और वह सब्जियां ही आज जीने का माध्यम बन गई हैं, जिन्हें भोजन उपलब्ध नहीं हो रहा उनके लिए यही सहारा बन गई हैं।
बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं इसकी वजह से वह चिंतित हैं कि हम स्कूल कब जाएंगे हालांकि वह स्कूल खुलने पर थोड़ा नाटक जरूर किया करते हैं लेकिन इस 21 दिन की बंदी की वजह से बच्चे भी बाहर निकलने के लिए तरस रहे हैं लेकिन एक बहुत बड़ा संयम बच्चों में भी देखने को मिल रहा है बच्चे इस विपत्ति काल को समझ रहे हैं और घर से बाहर जाने की जिद भी नहीं कर रहे उन्हें पता है की हमारे लिए क्या जरूरी है इसलिए बच्चे घर पर रहकर है इंडोर गेम्स खेल रहे हैं, कहानियां सुन रहे है और उनके साथ बच्चों को समय ना देने वाले पिता जो बाहर अपना रोजगार अपनी नौकरी की वजह से महीनों बाहर रहते हो कई-कई दिनों तक समय ना दे पाते हो वह उन बच्चों को समय दे रहे हैं, उनके साथ खेल रहे हैं और यह पल बच्चों के लिए अविस्मरणीय हो गया है। वह पुरुष जो समय नहीं दे पाते थे अपनी पत्नियों को वह अपनी पत्नियों को समय दे रहे हैं उनके साथ रसोई में हाथ बंटा रहे हैं और तरह-तरह के पकवान बनाना सीख रहे हैं इस बहाने 21 दिन की छुट्टी के अवसर को बच्चे अपने माता-पिता के साथ गुजार रहे हैं उनकी देखभाल कर रहे हैं कोई पांव दबा रहा है कि कोई उनकी पसंद की रेसिपी बना रहा है जिससे वह अपने दादा दादी का भी आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं और 90 का वह दौर जब कुछ इसी तरह की परिस्थितियां थी हमे कहीं आज भले ही यह संकट का दौर लग रहा होगा लेकिन बच्चों के लिए यह  दौर 90 वाला ही है जिसे हमने और आपने जिया होगा। उस 90 के दौर को फिंर से जीना मतलब यह प्रश्न खड़े करना कि कौन कहता है गुजरा हुआ कल वापस नही लौटता?
क्योंकि रामायण,महाभारत, शक्तिमान फिर से शुरू हो गया।दूरदर्शन से अच्छा अब कोई चैनल नही लग रहा। रामायण को बहुत चाव से देख रहे हैं और उसकी महत्वपूर्ण बातें ध्यान पूर्वक सुन रहे हैं, समझ रहे हैं। हो सकता है 90 के दशक में आने वाले रामायण के सीखा हुआ हम कुछ भूल गए हो? लेकिन आज उन्हें पुनः देखकर ऐसा लगता है कि फिर से हम अपने अंदर आज भी बहुत कुछ सुधार कर सकते हैं और अपने बच्चों में वह संस्कार डाल सकते हैं।
       कवि और साहित्यकार एक नई ऊर्जा से भरे हैं उन्हें तो इस तरह के मौकों की तलाश थी जिसमें वह एकांत में प्रकृति से पुनर्मिलन कर सकें,अपने हृदय से नई नई रचनाओं का सृजन कर सकें,प्रकृति से जुड़कर कवि और लेखक अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है क्योंकि रचने वाला रचयिता और रचना लिखने वाला लेखक एक-दूसरे के बेहद करीब हो जाते हैं और उन दोनों के बीच किसी प्रकार की दूरी नहीं रहती और उस आपसी मिलन से जो सृजन होता है वह अतुलनीय होता है। यह बहुत ही सुंदर अवसर है, हम उनके बारे में लिखें, सुने और समझे, जो इस विपत्ति काल में हमारे साथ खड़े हैं,इसमें चिकित्सको की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है,जो ईश्वर के साक्षात रुप में हमारे सामने हैं और इनको धन्यवाद देना बहुत ही छोटा शब्द लगने लगता है, साथ ही जो सफाई कर्मचारी हैं वह भी एक योद्धा के तौर पर इस लड़ाई में किसी से कम नहीं है हमारे देश के सभी योद्धा एक से बढ़कर एक हैं, हम शस्त्र विहीन होकर भी लड़ रहे हैं सभी भारतवासी इस वक्त सोशल नेटवर्किंग जैसे शस्त्र का प्रयोग कर रहे है और यह सौभाग्य की बात है कि हम दिन प्रतिदिन की घटनाओं को देख रहे हैं,सुन रहे हैं और समझ रहे हैं।
       इस वायरस ने तो ठान ही लिया था कि भारत की दुर्दशा कर ही डालें परंतु भारत में रहने वाले सनातन संस्कृति का अनुसरण करने वाले लोगों ने इसे भी मात देने की ठान ली है।और दिन प्रतिदिन मात दे भी रहे है। यह जो संकट काल का समय है इसको समाप्त करना हम सभी लोगों के हाथ में है, जब सब कुछ शांत हो जाएगा, संदेह के लिए कोई स्थान नहीं रह जायेगा,जिन पर विश्वास न हो फिंर भी विश्वास हो रहा हो।यह मनुष्य को सकारात्मकता की ओर ले जा रहा है। इस स्थिति में पुलिस की भूमिकाओं को नहीं नकारा जा सकता, सावधानी रखते हुए भी, वह अपने व्यवहार से इस विपरीत परिस्थिति में लोगो की जान बचा रहे हैं। बेतहाशा धरपकड़ से कुछ लोग घबरा तो रहे हैं लेकिन यह उनकी भलाई के लिए है।
       आज न्यायालय बंद है,हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, जिलाजेल, कारावास बंद है क्योंकि न्याय करने वाला ईश्वर है, ईश्वर ने अपने हाथों में सब कुछ ले रखा है,कैदी पैरोल पर रिहा हो रहे हैं उन्हें भी अपने परिजनों से मिलने का मौका मिल रहा है उनके साथ भोजन करने का सुखद एहसास मिल रहा है और शायद घर ही वह जगह है जो उन्हें उनकी गलतियों का एहसास कराएगी और वह मानव बनने के लिए आगे आएंगे। वह मनुष्यता की ओर आगे बढ़ेंगे।अपने कर्मों का प्रायश्चित कर वह एक सफल जीवन जीने की कोशिश करेंगे, अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देंगे।
      मनुष्य ने जब जब मनुष्यता छोड़ी है तब-तब प्रकृति ने उस पर कहर बरपाया है, यह मामूली बात नहीं है, इस संकेत को समझना आवश्यक है और सचेत होने की आवश्यकता है।
संकट काल में एक महिला की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है।भारत के निर्माण में स्त्री की महत्वपूर्ण भूमिका रही है चाहे वह प्राचीन काल से हो अथवा आज इस परिस्थिति में हो पुरुषों ने बाहर की बागडोर संभाली और महिलाओं ने अपने घर के अंदर कि आज पुरुष उस से मुक्त है परंतु महिला उस मोर्चे पर आज भी उसी साहस के साथ डटी हुई है, नारी के शत-प्रतिशत सहयोग से ही आज यह देश चल रहा है, समाज दौड़ रहा है।
नारी ने कभी भी अपने नैसर्गिक गुणों से अपने को दूर नहीं किया वह दया, ममता, त्याग, प्रेम और उदारता की प्रतिमूर्ति है और उसने कठिन परिस्थिति में परिवार के साथ गृहस्थी भी संभाली है, पुरुषों को भी संभाला है, समाज को भी संभाला है और देश को भी संभाला है।
स्त्री अपने अस्तित्व को अच्छी तरह पहचानती है बस कोशिश यह हो कि हर कोई उसके अस्तित्व को स्वीकारे, हर युद्ध काल में किसी ना किसी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और उसे याद किया जाता है और यह 21 दिन का युद्धकाल है।
हालांकि 365 दिन में स्त्रियों की भूमिका एक योद्धा सी ही होती है, लेकिन इस 21 दिन में स्त्री की भूमिका किसी सेनापति से कम बिल्कुल भी नहीं है।आइए हम सब मिलकर इन 21 दिनों को खुलकर जीये ।
योग साधना,ध्यान,प्राणायाम से अपने मस्तिष्क को शांत और एकाग्र चित्त बनाएं सकारात्मक सोच के साथ अपने शरीर के दुर्गुणों को दूर भगाएं और सकारात्मक भावनाओं को स्वयं से जोड़कर नकारात्मकता का विनाश करें,आइए हम सब प्रकृति से पुनर्मिलन करें और पृथ्वी को 21 दिनों के लिए सांस लेने दे।काश हर वर्ष कुछ दिनों के लिए इसी प्रकार प्रकृति भी रविवार सी छुट्टियां मनाएं।

लेखिका : पायल लक्ष्मी सोनी

*फॉउंडर/अध्यक्ष, प्रमिलादेवी मेमोरियल फाउंडेशन,
 *महानगर सह-संयोजिका,  नमामि गंगे/गंगा विचार मंच
*एसोसिएट मेम्बर ऑफ फ़िल्म राइटर एसोसिएशन,
*महानगर बौद्धिक प्रमुख,  राष्ट्र सेविका समि, काशी,
*मोटिवेशनल स्पीकर,
*लेखिका व कवयित्री