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बैंकों के राष्ट्रीयकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर पड़ा था
July 20, 2020 • AMIT VERMA • उत्तर प्रदेश

वेबवार्ता(न्यूज़ एजेंसी)/सूरज वर्मा
कानपुर 20 जुलाई। बैंको का राष्ट्रीयकरण सदियों से भारतीय किसान का खून चूस रही महाजनी सभ्यता पर एक मारक चोट थी। महाजनी पंजे से देहाती भारत की मुक्ति थी।
     बैंक ऑफ इंडिया के शाखा प्रबंधक सौरभ यादव ने कहा कि 1969 में हुए 14 बड़े बैंकों के राष्ट्रीयकरण ने ग़रीब को सहारा दिया। दुर्गम अंचलों में बैंकों की शाखाएं खुलीं। किसान को जरूरी छोटे कर्ज लेने का भरोसेमंद और सुरक्षित उपाय मिला। ग़रीब बच्चों को पढ़ने के लिए सहारा मिला। कुटीर उद्योगों को पनपने का रास्ता मिला। ये न हुआ होता तो नब्बे के बाद शुरू हुआ किसान आत्महत्याओं का सिलसिला सत्तर से भी शुरू हो सकता था।
      सरकारी बैंको से कहा गया कि वे ग़रीब जरूरतमंदों की आर्थिक सहायता में उदार बनें और धन्नासेठों के लिए सख़्त। ट्रैक्टर और जानवर और बढ़ईगीरी का सामान ख़रीदने के लिए दिया कर्ज़ एक बार डूब जाए तो चिंता न करें। बेहतर देखरेख के साथ दुबारा मदद करें। अपनी कमाई मोटे असामियों से करें। "बैंकिंग प्रणाली जैसी संस्था, जो हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचती है और जिसे लाखों लोगों तक पहुंचाना चाहिए, के पीछे आवश्यक रूप से कोई बड़ा सामाजिक उद्देश्य होना चाहिए जिससे वह प्रेरित हो और इन क्षेत्रों को चाहिए कि वह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं तथा उद्देश्यों को पूरा करने में अपना योगदान दें।"
      विशेषज्ञ कहते हैं कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर पड़ा। 1970 के दशक में राष्ट्रीय आय के प्रतिशत के तौर पर सकल घरेलू बचत लगभग दोगुनी हो गई। लेकिन बाद में इसमें काफी उतार-चढ़ाव आए। बैंकिंग सेवा के विस्तार और अर्थव्यवस्था को गति देने के उद्देश्य के अलावा इस राष्ट्रीयकरण का एक उद्देश्य बेरोज़गारी की समस्या से निपटना, समाज के कमजोर वर्गों तथा प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों के लोगों का बैंकिंग सेवाओं एवं सुविधाओं के माध्यम से उत्थान करके देश की आर्थिक उन्नति को एक नई दिशा प्रदान करना था।
      अपने अधिकतर उद्देश्यों में तो ये राष्ट्रीयकरण कामयाब हुआ और ये एक ऐतिहासिक और अच्छा फैसला माना गया। जैसे ऊपर भी बताया गया कि आज भी बैंकों की सेवाएँ लेने वाले लगभग 90 फ़ीसदी लोग सरकारी क्षेत्र के बैंकों की ही सेवाएँ लेते हैं। मगर अब इसे धीरे-धीरे फेल करने की कोशिश की जा रही है। सरकारी बैंकों का मर्जर किया जा रहा है। उनकी अपेक्षा निजी बैंकों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
     आईडीबीआई बैंक का उदाहरण इसे समझने के लिए बेहतर उदाहरण है। आईआरडीएआई ने एलआईसी को आईडीआईबी बैंक के 51% शेयरों को खरीदने के लिए मंजूरी दीI यह पहला सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक है जिसे सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण से बाहर निकाल दिया गया है। हाल ही में हुए बैंको  मर्जर को भी निजीकरण की ओर सरकार के बढ़ते कदम को ही दर्शाता है। नब्बे के बाद धीरे धीरे इस नीति को पलट दिया गया। बैंक गरीबों पर सख़्त होने लगे और धन्नासेठों के लिए परम उदार। महासेठों ने बेहिसाब कर्ज़ लिया और पी गए। पिछले कुछ वर्षों में यह प्रक्रिया तेजतर होती चली गई। माल्या, ललित, नीरव इसी प्रक्रिया की देन हैं।
     जाहिर है इस तरीक़ेकार को पलट कर फिर पटरी पर लाने की जरूरत है। लेकिन लगता ऐसा है कि वर्तमान सरकार द्वारा इस प्रकार के घोटालों का नाम लेकर बैंको के पूर्ण निजीकरण की योजना बना रही है। अब तक का हर अनुभव बताता है कि निजीकरण से घोटाले नहीं रुकते। बस कागज़ी रूप से वैध हो जाते हैं क्योंकि विधि विधान ही निजी हाथों में चला जाता है। असलियत में घोटालों का आकार विकराल हो जाता है। निजी अस्पताल और स्कूल इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। वे खुले हाथों पब्लिक को लूट रहे हैं लेकिन उनकी लूट कानूनी समझी जाती है, इसलिए घोटाले की श्रेणी में आती ही नहीं। बैंकों के निजीकरण के बाद भी यही होगा। घोटाले पकड़े नहीं जाएंगे क्योंकि उन्हें वैध रूप दे दिया जाएगा। लूट विकराल रूप से और बढ़ जाएगी जो आखिर आपके खून पसीने की कमाई की ही होगी। किसान के पास डूबते को जो तिनके का एक सहारा है, वह भी छिन जाएगा। बैंको का निजीकरण राष्ट्र के निजीकरण की प्रक्रिया की आख़िरी कड़ी होगी। देश की गर्दन पर एक प्रतिशत थैलीशाहों का शिकंजा पूरी तरह कस जाएगा। हो सके तो बचिए। ऐसा मत होने दीजिए।